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Kirat/kirad Yuvak Yuvati Parichay Program In Nagpur....

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Posted on 2016-03-26



Kirat/kirad Yuvak Yuvati Parichay Program had done Nagpur.... Contrary to popular belief, Lorem Ipsum is not simply random text. It has roots in a piece of classical Latin literature from 45 BC, making it over 2000 years old. Richard McClintock, a Latin professor at Hampden-Sydney College in Virginia, looked


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किरात/किराड समाजाच्या सहाव्या राष्ट्रीय अधिवेशन

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Posted on 2016-03-26



मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस आज किरात/किराड समाजाच्या सहाव्या राष्ट्रीय अधिवेशनाला उपस्थित होते. या समाजाच्या प्रगतीशील प्रवासावर त्यांनी आपल्या भाषणातून प्रकाश टाकला.
CM Devendra Fadnavis at 6th National Convention of Kirat/Kirad Samaj at Nagpur; talks about progressive journey of this community.


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किराड़-किरात समाज हल्दी कुमकुम कार्यक्रम १६/०१/२०१६

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Posted on 2016-03-26



किराड़-किरात समाज हल्दी कुमकुम कार्यक्रम १६/०१/२०१६ को पूर्व नागपुर यशश्वि रूप से आयोजित किया. इस कार्यक्रम में माता और बहनो ने सहभाग लिया . सभी किराड़-किरात भाई बंधुओ को धन्यवाद कार्यक्रम की रुपरेखा बनाने और सुचारू रूप से पार करने क लिए.


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The History of nagpur

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Posted on 2016-05-04



नागपुर की स्थापन लगभग 314 साल पूर्व यांनी 1702 मे नागपुर नगरी की स्थापन गोंड राजा बख्त बुलंद शाह प्रथम ने की थी। औरंगजेब से मिलने के बाद बख्त बुलंद शाह देवगढ़ से यहां आए। यहां के 12 गांवों को मिलाकर नागपुर नगरी की स्थापन की। इन 12 गांवों मे राजापुर, रायपुर,हिवरी, हरिपुर,वानडे,सक्करदरा,आकरी,लेडरा, फुटाला,गाडगे,भानखेडा, सीताबर्डी,शामिल थे।समये के साथ इनमें से कुछ नाम बदल गए है।उन्होंने गांवों को मुख्य मागों से जोडा आवश्यकता के अनुसार बाजार बनवाए। इस तरह नागपुर का धीरे - धीरे विकास होता रहा। औरंगजेब ने की थी मदद अभ्यासकों के अनुसार इसके पीछे राजा साहब की मजबूरी थी।वे अपना राज-पाट छोड़ कर यहां आए थे।देवगढ़ के तत्कालीन राजा कोकशाह की मुत्यु के पश्चात राजा बख्त बुलंद शाह गद्दी पर बैठे।यह बात राज परिवार के कुछ सदस्यो को खली।उन्होंने बख्त बुलंद को खत्म करने की योजना बनायी।इसकी भनक लगते ही बख्त बुलंद देवगढ़ से पलायन कर औरंगजेब के पास मदद मांगने गए। औरंगजेब ने उन्हें मदद का आश्वासन तो दिया मगर मुसलमान बनने की शर्त पर।मजबूर बख्त बुलंद को मुसलमान बनना पडा। लेकिन उन्होंने भी एक शर्त रखी कि वे अपनी बेटी का विवाह गोंडो से ही करेंगे।केवल व्यवसायिका व्यवहार रहेगा।औरंगजेब ने उसकी शर्त मानकर उनकी मदद की। देवगढ़ से हिंदी का आगमन जिन दिनों राज परिवार का साम्राज्य था, तब गोंड राजा के अपने सिक्के हुआ करते थे। आज वंशजो के पास एक भी सिक्का नहीं है। नागपुर में हिंदी भाषा लाने का श्रेय भी राजा बख्त बुलंद शाह को ही जाता है।शहर की स्थापना के बाद उन्होंने जो सिक्के बनाए, वे हिंदी में थे। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि नागपुर में हिंदी भाषा का आगमन देवगढ़ से ही हुआ है। बख्त बुलंद की मुत्यु सन 1709 के आसपास राजा बख्त बुलंद शाह की मुत्यु हो गई।मुत्यु की निश्चित तारीख को लेकर इतिहासकारों मतभेद है।बख्त बुलंद शाह के बाद राजा चांद सुल्तान ने गद्दी संभाली। चांद सुल्तान ने शहर में आवश्यकतानुसार अनेक वस्तुओं का निर्माण कराया।उन्होंने नगर में पाच महाद्वार बनाये। वर्तमान गांधीसागर बनाम जुम्मा तालाब और महल का प्रसिद्ध गांधी द्वार उन्हीं की देन है। उस समय गांधीसागर तालाब के पानी की आपूर्ति 12 गावों (नागपुर) को की जाती थी। तालाब का 25 प्रतिशत हिस्सा ही शेष रह गया है। गोंड राजाओं का कालखंड 1)राजा जाटबा 1580-1620 ( देवगड़ के संस्थापक ) 2)राजा कोकशाह कालवधि उपलब्ध नाही 3)राजा बख्त बुलंद शाह 1686-1709 ( इन्होंने 1702 मे नागपुर बसाया ) 4)राजा चांद सुल्तान 1709-1735 (इन्होंने महल स्थित जुम्मा(शुक्रवारी)तालाब और गांधी गेट (जुम्मा द्वार) बनाया ) 5)राजा वली शाह 1735-1738 6)राजा बुरहान शाह 1743-1796 7)राजा बहराम शाह 1796-1821 8)राजा रहमान शाह 1821-1852 9)राजा सुलेमान शाह 1852-1885 10)राजा आजम शाह 1885-1955 11)राजा बख्त बुलंद शाह दिवतीय 1955-1993 12)राजा वीरेंद्र शाह 1993 से एक सुचना है यह संदेश अपने मित्रों को और परिवार को जरुर भेजे। नागपुर का इतिहास है और खासकर नागपुर के लोग को पता होना चाहिए।


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कृष्णा जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाये

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Posted on 2016-08-23



श्री कृष्णजन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण का जनमोत्स्व है। योगेश्वर कृष्ण के भगवद गीता के उपदेश अनादि काल से जनमानस के लिए जीवन दर्शन प्रस्तुत करते रहे हैं। जन्माष्टमी भारत में हीं नहीं बल्कि विदेशों में बसे भारतीय भी इसे पूरी आस्था व उल्लास से मनाते हैं। श्रीकृष्ण ने अपना अवतार भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में लिया। चूंकि भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे अत: इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर मथुरा नगरी भक्ति के रंगों से सराबोर हो उठती है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन मौके पर भगवान कान्हा की मोहक छवि देखने के लिए दूर दूर से श्रद्धालु आज के दिन [[मथुरा] ]पहुंचते हैं। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर मथुरा कृष्णमय हो जात है। मंदिरों को खास तौर पर सजाया जाता है। ज्न्माष्टमी में स्त्री-पुरुष बारह बजे तक व्रत रखते हैं। इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती है और भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है। और रासलीला का आयोजन होता है।

उपवास के बारे में

अष्टमी दो प्रकार की है- पहली जन्माष्टमी और दूसरी जयंती। इसमें केवल पहली अष्टमी है।

स्कन्द पुराण के मतानुसार जो भी व्यक्ति जानकर भी कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को नहीं करता, वह मनुष्य जंगल में सर्प और व्याघ्र होता है। ब्रह्मपुराण का कथन है कि कलियुग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी में अट्ठाइसवें युग में देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए थे। यदि दिन या रात में कलामात्र भी रोहिणी न हो तो विशेषकर चंद्रमा से मिली हुई रात्रि में इस व्रत को करें। भविष्य पुराण का वचन है- श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को जो मनुष्य नहीं करता, वह क्रूर राक्षस होता है। केवल अष्टमी तिथि में ही उपवास करना कहा गया है। यदि वही तिथि रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो तो \\\\\\\'जयंती\\\\\\\' नाम से संबोधित की जाएगी। वह्निपुराण का वचन है कि कृष्णपक्ष की जन्माष्टमी में यदि एक कला भी रोहिणी नक्षत्र हो तो उसको जयंती नाम से ही संबोधित किया जाएगा। अतः उसमें प्रयत्न से उपवास करना चाहिए। विष्णुरहस्यादि वचन से- कृष्णपक्ष की अष्टमी रोहिणी नक्षत्र से युक्त भाद्रपद मास में हो तो वह जयंती नामवाली ही कही जाएगी। वसिष्ठ संहिता का मत है- यदि अष्टमी तथा रोहिणी इन दोनों का योग अहोरात्र में असम्पूर्ण भी हो तो मुहूर्त मात्र में भी अहोरात्र के योग में उपवास करना चाहिए। मदन रत्न में स्कन्द पुराण का वचन है कि जो उत्तम पुरुष है। वे निश्चित रूप से जन्माष्टमी व्रत को इस लोक में करते हैं। उनके पास सदैव स्थिर लक्ष्मी होती है। इस व्रत के करने के प्रभाव से उनके समस्त कार्य सिद्ध होते हैं। विष्णु धर्म के अनुसार आधी रात के समय रोहिणी में जब कृष्णाष्टमी हो तो उसमें कृष्ण का अर्चन और पूजन करने से तीन जन्मों के पापों का नाश होता है। भृगु ने कहा है- जन्माष्टमी, रोहिणी और शिवरात्रि ये पूर्वविद्धा ही करनी चाहिए तथा तिथि एवं नक्षत्र के अन्त में पारणा करें। इसमें केवल रोहिणी उपवास भी सिद्ध है। अन्त्य की दोनों में परा ही लें।

मोहरात्रि

श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी की रात्रि को मोहरात्रि कहा गया है। इस रात में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान, नाम अथवा मंत्र जपते हुए जगने से संसार की मोह-माया से आसक्तिहटती है। जन्माष्टमी का व्रत व्रतराज है। इसके सविधि पालन से आज आप अनेक व्रतों से प्राप्त होने वाली महान पुण्यराशिप्राप्त कर लेंगे।

व्रजमण्डलमें श्रीकृष्णाष्टमीके दूसरे दिन भाद्रपद-कृष्ण-नवमी में नंद-महोत्सव अर्थात् दधिकांदौ श्रीकृष्ण के जन्म लेने के उपलक्षमें बडे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। भगवान के श्रीविग्रहपर हल्दी, दही, घी, तेल, गुलाबजल, मक्खन, केसर, कपूर आदि चढाकर ब्रजवासीउसका परस्पर लेपन और छिडकाव करते हैं। वाद्ययंत्रोंसे मंगलध्वनिबजाई जाती है। भक्तजन मिठाई बांटते हैं। जगद्गुरु श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव नि:संदेह सम्पूर्ण विश्व के लिए आनंद-मंगल का संदेश देता है।

[source : https://en.wikipedia.org/wiki/Krishna_Janmashtami]

कृष्णा तेरी गलियों का जो आनंद है,
वो दुनिया के किसी कोने में नहीं ।
जो मजा तेरी वृंदावन की रज में है,
मैंने पाया किसी बिछौने में नहीं ।।


जय श्री कृष्णा


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जितना कठिन संघर्ष होंगा । जीत उतनी ही शानदार होंगी !

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Posted on 2016-09-14



किसी ने सिकन्दर से पुछा , " तुमने देशों पर देश किस प्रकार जीत लिए ? " तो उसने
उत्तर दिया, "मैं जब सोचता हू तो उस पर फौरन ही अमल भी करता हूँ  ।"
  नेपोलियन भी कभी झिझक से काम नहीं लेता था । जिस कम को भी वह उचित
समझता था, उसको फ़ौरन ही कर डालता था और केवल इसी एक गुण के कारण वह
समस्त यूरोप का अधिपति बन बैठा । वाटरलू के मैदान में उसकी हार हुई तो उसका
एकमात्र कारण यहीं था कि वह तुरन्त निर्णय न ले सका ।
  अत: आप भी यदि सफल होना चाहते है तो तुरन्त निर्णय लेने की आदत डालिये , लेकिन
इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि आप जो निर्णय लें उसके बारे में कोई विचार ही न करे ।
खूब सोच-समझकर ही निर्णय लें । निर्णय तो मूर्ख -व्यक्ति भी ले सकता है, लेकिन उसका
परिणाम आप स्वयं समझ सकते हैं । उससे कुछ निर्माण- नहीं हो सकता, विनाश ही होगा ।
जो व्यक्ति सदा इसी दुविधा में पड़े रहते हैं कि पहले कौनसा काम  किया जाय
अथवा वे व्यक्ति जो किसी अन्य व्यक्ति की बात सुनकर अपने निर्णय को ' बदल देते
हैं, कभी कुछ नहीं कर सकते । सफल वहीँ हो - सकते हैं जो बुद्धिमत्तापूर्ण, दृढ़ संकल्प
के सहारे  बिना छोटी-मोटी बातों से घबराए, निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहते
हैं । बहुत से व्यापारी अपने निर्णय पर ही अटल रहकर भारी लाभ कमा लेते हैं, हालांकि
  उसे कई बार भारी हानि भी उठानी पड़ती है, लेकिन अन्त में उन्हें लाभ ही होता है ।


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डॉ. आर.के.एस. धाकड ने रोशन किया समाज और देश का नाम

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Posted on 2016-09-15



आदरणीय डॉ. आर.के.एस.धाकड ने इटली की राजधानी रोम में आयोजित 37वीं SICOT वर्ल्ड अॉर्थोपीडिक कांग्रेस में शामिल होकर देश का प्रतिनिधित्व कर समाज व देश का नाम रोशन किया है । उन्होंने रोम में विश्वस्तरीय अॉर्थोपीडिक सम्मेलन को संबोधित किया । यहां देश-विदेश के मशहूर अॉर्थोपीडिक डॉक्टर एवं सर्जन आमंत्रित किए गए हैं ।

वे जी.आर.मेडीकल कॉलेज के प्रोफेसर एवं जे.ए.एच. अस्पताल ग्वालियर में हड्डी एवं जोड रोग के विशेषज्ञ व सर्जन चिकित्सक हैं ।

वे ग्रामीण पृष्ठभूमि से होकर भी बचपन से प्रतिभाशाली छात्र रहे हैं । अद्वितीय प्रतिभा के धनी डॉ. साहब ने किराड धाकड क्षत्रिय समाज का नाम रोशन किया है । समाज को अपनी इस अनमोल धरोहर पर गर्व है ।

आदरणीय डॉ. साहब को उनकी इस महत्वपूर्ण उपलब्धि पर बहुत बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएं


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किराड़ किरात समाज के सभी भाई बंधुओ को नवरात्री की हार्दिक शुभकामनाएं

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Posted on 2016-10-01



नवरात्रि एक हिंदू पर्व है। नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है 'नौ रातें'। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति / देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दसवाँ दिन दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है। नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है। पौष, चैत्र,आषाढ,अश्विन प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ रातों में तीन देवियों - महालक्ष्मी, महासरस्वती या सरस्वती और दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति / देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दुर्गा का मतलब जीवन के दुख कॊ हटानेवाली होता है। नवरात्रि एक महत्वपूर्ण प्रमुख त्योहार है जिसे पूरेभारत में महान उत्साह के साथ मनाया जाता है।

नौ देवियाँ है :-

 

शक्ति की उपासना का पर्व शारदीय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है। सर्वप्रथम श्रीरामचंद्रजी ने इस शारदीय नवरात्रि पूजा का प्रारंभ समुद्र तट पर किया था और उसके बाद दसवें दिन लंका विजय के लिए प्रस्थान किया और विजय प्राप्त की। तब से असत्य, अधर्म पर सत्य, धर्म की जीत का पर्व दशहरा मनाया जाने लगा। आदिशक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में क्रमशः अलग-अलग पूजा की जाती है। माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियाँ देने वाली हैं। इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन होती हैं। नवरात्रि के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है।

 

महत्व

 

नवरात्रि उत्सव देवी अंबा (विद्युत) का प्रतिनिधित्व है। वसंत की शुरुआत और शरद ऋतु की शुरुआत, जलवायु और सूरज के प्रभावों का महत्वपूर्ण संगम माना जाता है। इन दो समय मां दुर्गा की पूजा के लिए पवित्र अवसर माने जाते है। त्योहार की तिथियाँ चंद्र कैलेंडर के अनुसार निर्धारित होती हैं। नवरात्रि पर्व, माँ-दुर्गा की अवधारणा भक्ति और परमात्मा की शक्ति (उदात्त, परम, परम रचनात्मक ऊर्जा) की पूजा का सबसे शुभ और अनोखा अवधि माना जाता है। यह पूजा वैदिक युग से पहले, प्रागैतिहासिक काल से है। ऋषि के वैदिक युग के बाद से, नवरात्रि के दौरान की भक्ति प्रथाओं में से मुख्य रूप गायत्री साधना का हैं।

 

नवरात्रि के पहले तीन दिन

नवरात्रि के पहले तीन दिन देवी दुर्गा की पूजा करने के लिए समर्पित किए गए हैं। यह पूजा उसकी ऊर्जा और शक्ति की की जाती है। प्रत्येक दिन दुर्गा के एक अलग रूप को समर्पित है। त्योहार के पहले दिन बालिकाओं की पूजा की जाती है। दूसरे दिन युवती की पूजा की जाती है। तीसरे दिन जो महिला परिपक्वता के चरण में पहुंच गयी है उसकि पूजा की जाती है। देवी दुर्गा के विनाशकारी पहलु सब बुराई प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करने के प्रतिबद्धता के प्रतीक है।

 

नवरात्रि के चौथा से छठे दिन

व्यक्ति जब अहंकार, क्रोध, वासना और अन्य पशु प्रवृत्ति की बुराई प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर लेता है, वह एक शून्य का अनुभव करता है। यह शून्य आध्यात्मिक धन से भर जाता है। प्रयोजन के लिए, व्यक्ति सभी भौतिकवादी, आध्यात्मिक धन और समृद्धि प्राप्त करने के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा करता है। नवरात्रि के चौथे, पांचवें और छठे दिन लक्ष्मी- समृद्धि और शांति की देवी, की पूजा करने के लिए समर्पित है। शायद व्यक्ति बुरी प्रवृत्तियों और धन पर विजय प्राप्त कर लेता है, पर वह अभी सच्चे ज्ञान से वंचित है। ज्ञान एक मानवीय जीवन जीने के लिए आवश्यक है भले हि वह सत्ता और धन के साथ समृद्ध है। इसलिए, नवरात्रि के पांचवें दिन देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। सभी पुस्तकों और अन्य साहित्य सामग्रीयो को एक स्थान पर इकट्ठा कर दिया जाता हैं और एक दीया देवी आह्वान और आशीर्वाद लेने के लिए, देवता के सामने जलाया जाता है।

 

नवरात्रि का सातवां और आठवां दिन

सातवें दिन, कला और ज्ञान की देवी, सरस्वती, की पूजा की है। प्रार्थनायें, आध्यात्मिक ज्ञान की तलाश के उद्देश्य के साथ की जाती हैं। आठवे दिन पर एक 'यज्ञ' किया जाता है। यह एक बलिदान है जो देवी दुर्गा को सम्मान तथा उनको विदा करता है।

 

नवरात्रि का नौवां दिन

नौवा दिन नवरात्रि समारोह का अंतिम दिन है। यह महानवमी के नाम से भी जाना जाता है। ईस दिन पर, कन्या पूजन होता है। उन नौ जवान लड़कियों की पूजा होती है जो अभी तक यौवन की अवस्था तक नहीं पहुँची है। इन नौ लड़कियों को देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है। लड़कियों का सम्मान तथा स्वागत करने के लिए उनके पैर धोए जाते हैं। पूजा के अंत में लड़कियों को उपहार के रूप में नए कपड़े पेश किए जाते हैं।

 

[source:https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF]


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किराड़-किरात समाज की तरफ से दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं

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Posted on 2016-10-29



दीवाली या दीपावली अर्थात "रोशनी का त्योहार" शरद ऋतु (उत्तरी गोलार्द्ध) में हर वर्ष मनाया जाने वाला एक प्राचीन हिंदू त्योहार है।[2][3] दीवाली भारत के सबसे बड़े और प्रतिभाशाली त्योहारों में से एक है। यह त्योहार आध्यात्मिक रूप से अंधकार पर प्रकाश की विजय को दर्शाता है।[4][5][6]

भारतवर्ष में मनाए जाने वाले सभी त्यौहारों में दीपावली का सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। इसे दीपोत्सव भी कहते हैं। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात् ‘अंधेरे से ज्योति अर्थात प्रकाश की ओर जाइए’ यह उपनिषदों की आज्ञा है। इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं। जैन धर्म के लोग इसे महावीर के मोक्ष दिवस के रूप में मनाते हैं[7][8]तथा सिख समुदाय इसे बंदी छोड़ दिवस (en:Bandi Chhor Divas) के रूप में मनाता है।

माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा श्री रामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटे थे।[9] अयोध्यावासियों का ह्रदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से उल्लसित था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए। कार्तिकमास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्ष व उल्लास से मनाते हैं। यह पर्व अधिकतर ग्रिगेरियन कैलन्डर के अनुसार अक्टूबर या नवंबर महीने में पड़ता है। दीपावली दीपों का त्योहार है। भारतीयों का विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है झूठ का नाश होता है। दीवाली यही चरितार्थ करती है- असतो माऽ सद्गमय, तमसो माऽ ज्योतिर्गमय। दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है। कई सप्ताह पूर्व ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती हैं। लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन, सफ़ेदी आदि का कार्य होने लगता है। लोग दुकानों को भी साफ़ सुथरा कर सजाते हैं। बाज़ारों में गलियों को भी सुनहरी झंडियों से सजाया जाता है। दीपावली से पहले ही घर-मोहल्ले, बाज़ार सब साफ-सुथरे व सजे-धजे नज़र आते हैं।

 

शब्द उत्पत्ति

दिवाली शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों 'दीप' अर्थात 'दिया' व 'आवली' अर्थात 'लाइन' या 'श्रृंखला' के मिश्रण से हुई है। इसके उत्सव में घरों के द्वारों, घरों व मंदिरों पर लाखों प्रकाशकों को प्रज्वलित किया जाता है। दीपावली जिसे दिवाली भी कहते हैं उसे अन्य भाषाओं में अलग-अलग नामों से पुकार जाता है जैसे : 'दीपावली' (उड़िया), दीपाबॉली'(बंगाली), 'दीपावली' (असमी, कन्नड़, मलयालम:ദീപാവലി, तमिल:தீபாவளி और तेलुगू), 'दिवाली' (गुजराती, हिन्दी, दिवाली, मराठी:दिवाळी, कोंकणी:दिवाळी,पंजाबी), 'दियारी' (सिंधी:दियारी‎), और 'तिहार' (नेपाली)।

इतिहास

भारत में प्राचीन काल से दीवाली को हिंदू कैलेंडर के कार्तिक माह में गर्मी की फसल के बाद के एक त्योहार के रूप में दर्शाया गया। दीवाली का पद्म पुराण और स्कन्द पुराण नामक संस्कृत ग्रंथों में उल्लेख मिलता है जो माना जाता है कि पहली सहस्त्राब्दी के दूसरे भाग में किन्हीं केंद्रीय पाठ को विस्तृत कर लिखे गए थे। दीये (दीपक) को स्कन्द पुराण में सूर्य के हिस्सों का प्रतिनिधित्व करने वाला माना गया है, सूर्य जो जीवन के लिए प्रकाश और ऊर्जा का लौकिक दाता है और जो हिन्दू कैलंडर अनुसार कार्तिक माह में अपनी स्तिथि बदलता है।[11][12] कुछ क्षेत्रों में हिन्दू दीवाली को यम और नचिकेता की कथा के साथ भी जोड़ते हैं।[13]नचिकेता की कथा जो सही बनाम गलत, ज्ञान बनाम अज्ञान, सच्चा धन बनाम क्षणिक धन आदि के बारे में बताती है; पहली सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व उपनिषद में दर्ज़ की गयी है।[14]

7 वीं शताब्दी के संस्कृत नाटक नागनंद में राजा हर्ष ने इसे दीपप्रतिपादुत्सव: कहा है जिसमें दिये जलाये जाते थे और नव दुल्हन और दूल्हे को तोहफे दिए जाते थे।[15][16] 9 वीं शताब्दी में राजशेखर ने काव्यमीमांसा में इसे दीपमालिका कहा है जिसमें घरों की पुताई की जाती थी और तेल के दीयों से रात में घरों, सड़कों और बाजारों सजाया जाता था।[15] फारसी यात्री और इतिहासकार अल बेरुनी, ने भारत पर अपने 11 वीं सदी के संस्मरण में, दीवाली को कार्तिक महीने में नये चंद्रमा के दिन पर हिंदुओं द्वारा मनाया जाने वाला त्यौहार कहा है।[17]

महत्त्व

दीपावली नेपाल और भारत में सबसे सुखद छुट्टियों में से एक है। लोग अपने घरों को साफ कर उन्हें उत्सव के लिए सजाते हैं। नेपालियों के लिए यह त्योहार इसलिए महान है क्योंकि इस दिन से नेपाल संवत में नया वर्ष शुरू होता है।

दीपावली नेपाल और भारत में सबसे बड़े शॉपिंग सीजन में से एक है; इस दौरान लोग कारें और सोने के गहनों के रूप में भी महंगे आइटम तथा स्वयं और अपने परिवारों के लिए कपड़े, उपहार, उपकरणों, रसोई के बर्तन आदि खरीदते हैं।[18] लोगों अपने परिवार के सदस्यों और दोस्तों को उपहार स्वरुप आम तौर पर मिठाइयाँ व सूखे मेवे देते हैं। इस दिन बच्चे अपने माता-पिता और बड़ों से अच्छाई और बुराई या प्रकाश और अंधेरे के बीच लड़ाई के बारे में प्राचीन कहानियों, कथाओं, मिथकों के बारे में सुनते हैं। इस दौरान लड़कियाँ और महिलाऐं खरीदारी के लिए जाती हैं और फर्श, दरवाजे के पास और रास्तों पर रंगोली और अन्य रचनात्मक पैटर्न बनाती हैं। युवा और वयस्क आतिशबाजी और प्रकाश व्यवस्था में एक दूसरे की सहायता करते हैं।[19][20]

क्षेत्रीय आधार पर प्रथाओं और रीति-रिवाजों में बदलाव पाया जाता है। धन और समृद्धि की देवी - लक्ष्मी या एक से अधिक देवताओं की पूजा की जाती है। दीवाली की रात को, आतिशबाजी आसमान को रोशन कर देती है। बाद में, परिवार के सदस्यों और आमंत्रित दोस्त भोजन और मिठायों के साथ रात को मनाते हैं।[19][20]

आध्यात्मिक महत्त्व

दीपावली को विभिन्न ऐतिहासिक घटनाओं, कहानियों या मिथकों को चिह्नित करने के लिए हिंदू, जैन और सिखों द्वारा मनायी जाती है लेकिन वे सब बुराई पर अच्छाई, अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और निराशा पर आशा की विजय के दर्शाते हैं।[4][21]

हिंदू दर्शन में योग, वेदांत, और सामख्या विद्यालय सभी में यह विश्वास है कि इस भौतिक शरीर और मन से परे वहां कुछ है जो शुद्ध अनंत, और शाश्वत है जिसे आत्मन् या आत्मा कहा गया है। दीवाली, आध्यात्मिक अंधकार पर आंतरिक प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान, असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई का उत्सव है।[22][23][24][25]

हिंदुत्व

 
दीपावली धन की देवी लक्ष्मी के सम्मान में मनाई जाती है

दीपावली का धार्मिक महत्व हिंदू दर्शन, क्षेत्रीय मिथकों, किंवदंतियों, और मान्यताओं पर निर्भर करता है।

प्राचीन हिंदू ग्रन्थ रामायण में बताया गया है कि, कई लोग दीपावली को 14 साल के वनवास पश्चात भगवान राम व पत्नी सीता और उनके भाई लक्ष्मण की वापसी के सम्मान के रूप में मानते हैं।[26] अन्य प्राचीन हिन्दू महाकाव्य महाभारत अनुसार कुछ दीपावली को 12 वर्षों के वनवास व 1 वर्ष के अज्ञातवास के बाद पांडवों की वापसी के प्रतीक रूप में मानते हैं। कई हिंदु दीपावली को भगवान विष्णु की पत्नी तथा उत्सव, धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी से जुड़ा हुआ मानते हैं। दीपावली का पांच दिवसीय महोत्सव देवताओं और राक्षसों द्वारा दूध के लौकिक सागर के मंथन से पैदा हुई लक्ष्मी के जन्म दिवस से शुरू होता है। दीपावली की रात वह दिन है जब लक्ष्मी ने अपने पति के रूप में विष्णु को चुना और फिर उनसे शादी की।[11][27] लक्ष्मी के साथ-साथ भक्त बाधाओं को दूर करने के प्रतीक गणेश; संगीत, साहित्य की प्रतीक सरस्वती; और धन प्रबंधक कुबेर को प्रसाद अर्पित करते हैं[11] कुछ दीपावली को विष्णु की वैकुण्ठ में वापसी के दिन के रूप में मनाते है। मान्यता है कि इस दिन लक्ष्मी प्रसन्न रहती हैं और जो लोग उस दिन उनकी पूजा करते है वे आगे के वर्ष के दौरान मानसिक, शारीरिक दुखों से दूर सुखी रहते हैं। [28]

भारत के पूर्वी क्षेत्र उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में हिन्दू लक्ष्मी की जगह काली की पूजा करते हैं, और इस त्योहार को काली पूजा कहते हैं।[29][30] मथुरा और उत्तर मध्य क्षेत्रों में इसे भगवान कृष्ण से जुड़ा मानते हैं। अन्य क्षेत्रों में, गोवर्धन पूजा (या अन्नकूट) की दावत में कृष्ण के लिए 56 या 108 विभिन्न व्यंजनों का भोग लगाया जाता है और सांझे रूप से स्थानीय समुदाय द्वारा मनाया जाता है।

भारत के कुछ पश्चिम और उत्तरी भागों में दीवाली का त्योहार एक नये हिन्दू वर्ष की शुरुआत का प्रतीक हैं।

दीप जलाने की प्रथा के पीछे अलग-अलग कारण या कहानियाँ हैं। राम भक्तों के अनुसार दीवाली वाले दिन अयोध्या के राजा राम लंका के अत्याचारी राजा रावण का वध करके अयोध्या लौटे थे। उनके लौटने कि खुशी मे आज भी लोग यह पर्व मनाते है। कृष्ण भक्तिधारा के लोगों का मत है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था।[31][32][33] इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने घी के दीए जलाए। एक पौराणिक कथा के अनुसार विंष्णु ने नरसिंह रुप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था[33] तथा इसी दिन समुद्रमंथन के पश्चात लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए।
[Source : https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A6%E0%A5%80%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%80]


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For the cost of an iPhone, you can now buy a wind turbine that can power an entire house for lifetime

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Posted on 2016-11-04



Indian startup Avant Garde Innovations has developed a low-cost wind turbine that can generate 3-5 kW hours of electricity daily

By Sainul Abudheen K

 

 

Soon after assuming office, Kerala (southern state of India) Chief Minister Pinarayi Vijayan kicked up a storm by publicly supporting the Athirappilly hydro electric project, which environmentalists said, if implemented, would create ecologic imbalance in the area and destroy the Athirappilly waterfalls, the largest natural waterfalls in the state.

It is not that the government is oblivious to the impact that the project could make, but it says it has no option but to leverage existing means to check the growing power crisis in Kerala, which partially depends on the private sector for electricity.

 

Things are no different in other states either. While Kerala has attained almost 100 per cent electrical coverage, many parts of India still remain in the dark. For a large portion of the Indian population, electricity to this day remains a distant dream.

Enter two siblings who want to make India’s energy crisis a thing of the past. The duo has developed a new solution they say will not even slightly impact the ecological balance.

Avant Garde Innovations, the startup founded by siblings Arun and Anoop George from Kerala, has come up with a low-cost wind turbine that can generate enough electricity to power an entire house for a lifetime. The size of a ceiling fan, this wind turbine can generate 5 kWh/kW per day — with just a one-time cost of US$750.

“Our goal is to eliminate energy poverty, reduce dependence on struggling state power grids and create energy self sufficiency for all the needy ones through distributed, localised and affordable renewable energy. In doing so, we believe we can collectively usher in our world a cleaner environment, new economic prosperity and social change,” reads the company ‘What We Do’ statement.

“Our first offering is a highly affordable small wind turbine suitable for residential, commercial, agricultural, village electrification and other uses, which is aimed for a market launch during 2016.”

Incorporated in 2015, Avant Garde claims to be a startup with a ‘green’ heart and soul.

For the startup, opportunity is massive. India is the world’s sixth largest energy consumer, accounting for 3.4 per cent of global energy consumption. Federal governments in India, and the central government for that matter, are unable to bear the huge infrastructural cost required to bring electricity to remote villages.

Erecting electric posts and electric lines require huge investments that could cost millions of dollars.

This is where Avant Garde comes into picture. “When small wind turbine generating 1kW energy costs INR 3-7 lakh (US$4,000-10,000), our company plans to sell it at less than NR 50,000 (about US$750). Costs will decrease further through mass production,” Arun said in an interview to The Times of India.

 

The company launched its pilot project at a church in the capital city of Thiruvananthapuram in January this year. The small wind turbine prototype that it has developed is highly scalable for power capacities of 300 kW or even higher, Arun told e27.

“Our passionate aim is to introduce innovative, affordable and sustainable solutions that take renewable energy self sufficiency and energy empowerment to the next level through a distributed and decentralised approach using pioneering strategies the world has not witnessed yet,” the company says.

This revolutionary product has also won them a spot in the Top 20 Cleantech Innovations in India. The company has also made it to the list of 10 clean energy companies from India for the “UN Sustainable Energy For All” initiative under the one billion dollar clean energy investment opportunity directory.

According to the Global Wind Energy Council, the country ranks 4th in terms of global installed wind power capacity, after China, the US, and Germany.

Maybe, if Avant Garde Innovations takes off, Kerala can keep the Athirappilly waterfalls untouched.

Source : e27.co


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"प्राचीन स्वास्थ्य दोहावली"

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Posted on 2016-12-06



पानी में गुड डालिए, बीत जाए जब रात!
सुबह छानकर पीजिए, अच्छे हों हालात!!

धनिया की पत्ती मसल, बूंद नैन में डार!
दुखती अँखियां ठीक हों, पल लागे दो-चार!!

ऊर्जा मिलती है बहुत, पिएं गुनगुना नीर!
कब्ज खतम हो पेट की, मिट जाए हर पीर!!

प्रातः काल पानी पिएं, घूंट-घूंट कर आप!
बस दो-तीन गिलास है, हर औषधि का बाप!!

ठंडा पानी पियो मत, करता क्रूर प्रहार!
करे हाजमे का सदा, ये तो बंटाढार!!

भोजन करें धरती पर, अल्थी पल्थी मार!
चबा-चबा कर खाइए, वैद्य न झांकें द्वार!!

प्रातः काल फल रस लो, दुपहर लस्सी-छांस!
सदा रात में दूध पी, सभी रोग का नाश!!

प्रातः- दोपहर लीजिये, जब नियमित आहार!                                                 

तीस मिनट की नींद लो, रोग न आवें द्वार!!

भोजन करके रात में, घूमें कदम हजार!
डाक्टर, ओझा, वैद्य का , लुट जाए व्यापार !!

घूट-घूट पानी पियो, रह तनाव से दूर!
एसिडिटी, या मोटापा, होवें चकनाचूर!!

अर्थराइज या हार्निया, अपेंडिक्स का त्रास!
पानी पीजै बैठकर,  कभी न आवें पास!!

रक्तचाप बढने लगे, तब मत सोचो भाय!
सौगंध राम की खाइ के, तुरत छोड दो चाय!!

सुबह खाइये कुवंर-सा, दुपहर यथा नरेश!
भोजन लीजै रात में, जैसे रंक सुरेश!!

देर रात तक जागना, रोगों का जंजाल!
अपच,आंख के रोग सँग, तन भी रहे निढाल^^

दर्द, घाव, फोडा, चुभन, सूजन, चोट पिराइ!
बीस मिनट चुंबक धरौ, पिरवा जाइ हेराइ!!

सत्तर रोगों कोे करे, चूना हमसे दूर!
दूर करे ये बाझपन, सुस्ती अपच हुजूर!!

भोजन करके जोहिए, केवल घंटा डेढ!
पानी इसके बाद पी, ये औषधि का पेड!!

अलसी, तिल, नारियल, घी सरसों का तेल!
यही खाइए नहीं तो, हार्ट समझिए फेल!

पहला स्थान सेंधा नमक, पहाड़ी नमक सु जान!
श्वेत नमक है सागरी, ये है जहर समान!!

अल्यूमिन के पात्र का, करता है जो उपयोग!
आमंत्रित करता सदा, वह अडतालीस रोग!!

फल या मीठा खाइके, तुरत न पीजै नीर!
ये सब छोटी आंत में, बनते विषधर तीर!!

चोकर खाने से सदा, बढती तन की शक्ति!
गेहूँ मोटा पीसिए, दिल में बढे विरक्ति!!

रोज मुलहठी चूसिए, कफ बाहर आ जाय!
बने सुरीला कंठ भी, सबको लगत सुहाय!!

भोजन करके खाइए, सौंफ,  गुड, अजवान!
पत्थर भी पच जायगा, जानै सकल जहान!!

लौकी का रस पीजिए, चोकर युक्त पिसान!
तुलसी, गुड, सेंधा नमक, हृदय रोग निदान!

चैत्र माह में नीम की, पत्ती हर दिन खावे !
ज्वर, डेंगू या मलेरिया, बारह मील भगावे !!

सौ वर्षों तक वह जिए, लेते नाक से सांस!
अल्पकाल जीवें, करें, मुंह से श्वासोच्छ्वास!!

सितम, गर्म जल से कभी, करिये मत स्नान!
घट जाता है आत्मबल, नैनन को नुकसान!!

हृदय रोग से आपको, बचना है श्रीमान!
सुरा, चाय या कोल्ड्रिंक, का मत करिए पान!!

अगर नहावें गरम जल, तन-मन हो कमजोर!
नयन ज्योति कमजोर हो, शक्ति घटे चहुंओर!!

तुलसी का पत्ता करें, यदि हरदम उपयोग!
मिट जाते हर उम्र में,तन में सारे रोग। 🌸


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किराड़ किरात समाज के तरफ से आप सभी को नव-वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये

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Posted on 2016-12-31



  • आपकी आँखों में सजे हैं जो भी सपने;
    और दिल में छुपी हैं जो भी अभिलाषाएं;
    यह नया वर्ष उन्हें सच कर जाए;
    आपके लिए यही है हमारी शुभकामनाएं!
    नव वर्ष की शुभकामनाएं!
  • --------------------------------------------------
  • भुलाकर सारे दुःख भरे पल;
    दिल में बसा लो आने वाले कल को;
    मुस्कुराओ खुल कर चाहे जो भी हो पल;
    क्योंकि आ रहा है नया साल लेकर खुशियों के पल।
    नव वर्ष की शुभ कामनायें!
  • --------------------------------------------------------------
  • नया साल आया बनकर उजाला;
    खुल जाए आपकी किस्मत का ताला;
    हमेशा आप पर मेहरबान रहे ऊपर वाला;
    यही दुआ करता है आपका ये चाहने वाला।
    नया साल मुबारक।
  • ------------------------------
  • किराड़ किरात समाज के तरफ से आप सभी को नव-वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये


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Maa

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Posted on 2017-01-04



Maa


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What Is Makar Sakranti

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Posted on 2017-01-13



मीठे गुड में मिल गया तिल,
उडी पतंग और खिल गया दिल,
हर पल सुख ओर हर दिन शांति,
आप सब के लिए लाये मकर संक्रांति ||
 
 
Makar Sankranti is celebrated every year on JANUARY 14th. Makar Sankranti marks the end of a long winter with the return

Of the Sun to the Northern Hemisphere. Makara literally means 'Capricorn' and Sankranti Is the day when the sun passes from

One sign of the zodiac to the next.

 

The Sankranti of any month is considered auspicious as it

Signifies a fresh start. However Makara Sankranti is celebrated

In the month of Magha when the sun passes through the winter solstice, from the Tropic of Cancer to the Tropic of Capricorn.

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This festival has been celebrated for thousands of years. Initially, this was probably a festival celebrated in the cold climate, when people prayed for the warmth of the sun. In all likelihood, the Aryans celebrated it, and continued to do so after migrating to India. Today, Makara Sankranti is celebrated throughout India As a harvest festival.

Makar Sankranti is usually celebrated on January 14, mark the beginning festive calendar of each year for most of India. Flying kites, bonfires, enjoying homemade delicacies is the order of the day. Makar Sankranti marks the transition of the Sun into the zodiac sign of Makara (Capricorn) on its celestial path. The day is also believed to mark the arrival of spring in India and is a traditional event. It is celebrated all over South Asia with some regional variations.

In Tamil Nadu, Karnataka, Andhra Pradesh, and Telangana this festival is considered as the major festival. On this festival, people will make a bonfire which is a day before Makara Sankranti. Sun is the main god on this festival. People will participate in many events like holy dip in the water bodies, flying kites, worshipping animals, giving charity, preparing sweets.



This is a festival of joy and happiness that should be shared with one another. If you want to make a wish to your buddies, bloodline, or dear ones then send the wishes we have listed below to them and let them know what a well-wisher you are for them.

 

*A beautiful, bright and delightful day,
The sun entered makar to intense its rays.
Crops harvested to brighten up the smile,
Come together and enjoy all the while.
Kites flying high to touch the happiness,
Til mangled with sweet to spread sweetness.
Time to enjoy the moment with full intensity,
A very happy prosperous Makar Sankranti

 

 


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किराड़ किरात समाज के तरफ से सौरभ नानोरे को बहोत सारी शुभकामनाये !

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Posted on 2017-02-10



 
नेशनल रोलबॉल स्केटिंग दिसम्बर २०१६ को पुणे में आयोजित किया गया था | इस खेल में हमारे किराड़ समाज को छात्र सौरभ नानोरे का मुम्बई से सिलेक्शन हुआ था | इस खेल प्रतियोगिता में सौरभ (महाराष्ट्र ) टीम ने साहसिक टक्कर देते हुए प्रथम स्थान प्राप्त किया !

सौरभ  नानोरे को पुणे में गोल्ड मैडल और सर्टिफिकेट से नवाजा गया ! हाल ही में ९/०२/२०१६ को गोंदिया में हुए मनोहर भाई पटेल जन्मदिन समारोह में श्री नितीश कुमार (बिहार मुख्यमंत्री ) और प्रपुल भाई पटेल के तरफ से प्रोस्ताहन  पत्रिका दी गयी |

किराड़ किरात समाज के तरफ से ऐसे सभी मेघावी छात्र को बहोत सारी शुभकामनाये !
 
 

Rollball is a game played between two teams of 12 players. Out of 12, only 6 players are allowed to play on court at a time. This game is played on skates. The ball can be held in single hand or both hands, even during passing. A player must dribble the ball while carrying it. In this players of both team has to goal and the team who is able to goal more than the opponent team wins. There are two referees in a match.This game was created by Raju Dabhade of Pune City, India, while he was the sports teacher at MES Bal Shikshan Mandir, English Medium School, and is also the Secretary of the International Rollball Federation.


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महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाये

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Posted on 2017-02-24



महाशिवरात्रि

महाशिवरात्रि (बोलचाल में शिवरात्रि): हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। यह भगवान शिव का प्रमुख पर्व है।

फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि में भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं। इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा गया। कई स्थानों पर यह भी माना जाता है कि इसी दिन भगवान शिव का विवाह हुआ था। साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि की सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।[1]

कश्मीर शैव मत में इस त्यौहार को हर-रात्रि और बोलचाल में 'हेराथ' या 'हेरथ' भी जाता है।[


कथाएं

महाशिवरात्रि से संबधित कई पौराणिक कथायें है:

समुद्र मंथन


महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव ने कालकूट नामक विष को अपने कंठ में रख लिया था। जो समुद्र मंथन के समय बाहर आया था।


शिकारी कथा


एक बार पार्वती जी ने भगवान शिवशंकर से पूछा, 'ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?' उत्तर में शिवजी ने पार्वती को 'शिवरात्रि' के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- 'एक बार चित्रभानु नामक एक शिकारी था | पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।'

शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल-वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो विल्वपत्रों से ढका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।

पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुंची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई।

कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे पारधी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।' शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे पारधी!' मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो।

शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान मांग रही हूं। हे पारधी! मेरा विश्वास कर, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं।

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में बेल-वृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।' उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गया। भगवान शिव की अनुकंपा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।

थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया। देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहे थे। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प-वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए'।

अनुष्ठान

इस अवसर पर भगवान शिव का अभिषेक अनेकों प्रकार से किया जाता है। जलाभिषेक : जल से और दुग्‍धाभिषेक : दूध से। बहुत जल्दी सुबह-सुबह भगवान शिव के मंदिरों पर भक्तों, जवान और बूढ़ों का ताँता लग जाता है वे सभी पारंपरिक शिवलिंग पूजा करने के लिए आते हैं और भगवान से प्रार्थना करते हैं। भक्त सूर्योदय के समय पवित्र स्थानों पर स्नान करते हैं जैसे गंगा, या (खजुराहो के शिव सागर में) या किसी अन्य पवित्र जल स्रोत में। यह शुद्धि के अनुष्ठान हैं, जो सभी हिंदू त्योहारों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। पवित्र स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहने जाते हैं, भक्त शिवलिंग स्नान करने के लिए मंदिर में पानी का बर्तन ले जाते हैं महिलाओं और पुरुषों दोनों सूर्य, विष्णु और शिव की प्रार्थना करते हैं मंदिरों में घंटी और "शंकर जी की जय" ध्वनि गूंजती है। भक्त शिवलिंग की तीन या सात बार परिक्रमा करते हैं और फिर शिवलिंग पर पानी या दूध भी डालते हैं।

शिव पुराण के अनुसार, महाशिवरात्रि पूजा में छह वस्तुओं को अवश्य शामिल करना चाहिए:

शिव लिंग का पानी, दूध और शहद के साथ अभिषेक। बेर या बेल के पत्ते जो आत्मा की शुद्धि का प्रतिनिधित्व करते हैं;

  • सिंदूर का पेस्ट स्नान के बाद शिव लिंग को लगाया जाता है। यह पुण्य का प्रतिनिधित्व करता है;
  • फल, जो दीर्घायु और इच्छाओं की संतुष्टि को दर्शाते हैं;
  • जलती धूप, धन, उपज (अनाज);
  • दीपक जो ज्ञान की प्राप्ति के लिए अनुकूल है;
  • और पान के पत्ते जो सांसारिक सुखों के साथ संतोष अंकन करते हैं।


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राम नवमी

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Posted on 2017-04-26



 राम नवमी भगवान श्री राम का जन्म दिवस हैं. वास्तव में भगवान राम ने पुरुष चरित्र को चरितार्थ किया था . इन्होने अपने कर्म और धर्म को जीवन का आधार बनाया था . भगवान विष्णु ने राम का रूप धरकर धरती वासियों को सदमार्ग दिखाया था . और इसी कारण उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम राम भी कहा जाता हैं.


रामनवमी का त्यौहार चैत्र शुक्ल की नवमी मनाया जाता है. हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान श्री राम जी का जन्म हुआ था.

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राम जन्म कथा

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हिन्दु धर्म शास्त्रो के अनुसार त्रेतायुग में रावण के अत्याचारो को समाप्त करने तथा धर्म की पुन: स्थापना के लिये भगवान विष्णु ने मृत्यु लोक में श्री राम के रुप में अवतार लिया था. श्रीराम चन्द्र जी का जन्म चैत्र शुक्ल की नवमी [2] के दिन पुनर्वसु नक्षत्र तथा कर्क लग्न में कौशल्या की कोख से , राजा दशरथ के घर में हुआ था

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रामनवमी पूजन

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रामनवमी के त्यौहार का महत्व हिंदु धर्म सभ्यता में महत्वपूर्ण रहा है. इस पर्व के साथ ही माँ दुर्गा के नवरात्रों का समापन भी होता है.हिन्दू धर्म में रामनवमी के दिन पूजा की जाती है।रामनवमी की पूजा में पहले देवताओं पर जल, रोली और लेपन चढ़ाया जाता है, इसके बाद मूर्तियों पर मुट्ठी भरके चावल चढ़ाये जाते हैं। पूजा के बाद आ‍रती की जाती है.

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रामनवमी का महत्व

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यह पर्व भारत में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। रामनवमी के दिन ही चैत्र नवरात्र की समाप्ति भी हो जाती है। हिंदु धर्म शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान श्री राम जी का जन्म हुआ था अत: इस शुभ तिथि को भक्त लोग रामनवमी के रुप में मनाते हैं एवं पवित्र नदियों में स्नान करके पुण्य के भागीदार होते है.

[Source: https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE_%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%AE%E0%A5%80]

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Ram ji ki jyoti se noor milta hai
Sabke dilo ko shurur milta hai
Jo bhi jata hai ram ji ke dwar
Kuch na kuch jarur milta hai.
“Happy Ram Navmi”.


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भव्य ज्ञान विज्ञान व चेतना जाग्रति का प्रोग्राम

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Posted on 2017-06-06



११जून २०१७,को नागपुर मे किराड़ समाज की धरमशाला एक नाथ मंदिर में सतरंजीपुरा नागपुर में भव्य ज्ञान विज्ञान व चेतना जाग्रति का प्रोग्राम रखा गया है सभी समाजबंधु सादर आमंत्रित है।
डाँ. तेजसिंह किराड़ महासचिव,
महा. किराड़-किरात समाज संगठन

 

भव्य ज्ञान विज्ञान व चेतना जाग्रति का प्रोग्राम


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महाराष्ट्र किराड़ किरात समाज नागपुर द्वारा व्यक्तिगत विकास प्रशिक्षण शिबिर का शुभारभ किया गया

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Posted on 2017-06-11



personality development
महाराष्ट्र  किराड़ किरात समाज नागपुर द्वारा दिनांक ११/०६ /१७  को समाज भवन (संत एकनाथ मंदिर ) में व्यक्तिगत विकास प्रशिक्षण शिबिर का शुभारभ किया गया | जिसमे समाज के विद्यार्थी तथा उनके पलकों  ने बड़ी संख्या में उपस्थिति दर्ज कराई |  प्रमुख वक्ता के रूप  में श्रीमती श्रद्धा जैन ने विशेष रूपसे टाइम मनगमेंट (Time  management) के विषय पर मार्गदर्शन किया  | जिसका समाज के विद्यार्थियों  ने भरपूर लाभ लिया | मार्गदर्शन शिबिर सतत हर रविवार (Sunday) को शुरू रहेगा (9 से 11  बजेतक ) | जिसमे अलग अलग विषयों पर मार्गदर्शन प्राप्त होगा | 
personality development
कार्यक्रम की अध्यक्षता गरीबदासजी हरोड़े ने की | मंच संचालन श्री  तेजसिंग किराड़ ने किया | प्रमुख उपस्तिथी समाज अध्यक्ष श्री राजेश झाड़े की रही  व  आभार प्रदर्शन श्री लक्ष्मीकांत दादूरिया ने किया | 
 
 
http://kirad.in/images/events/personality2.jpg
 
 10 वी  तथा  12 वी  (cbsc / state  board ) के विद्यार्थियों की  भविष्य में समाज की ओर से 60 % से अधिक गुण प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के सम्मान करने योजना  बनायीं गयी है | जिसके लिए प्रमाणित मार्क लिस्ट (mark-list ) पदाधिकारी तक जल्द  से जल्द पहुंचाने  का अनुरोध  समाज के भाई-बंधुओं  से किया गया | 


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किराड़ किरात किरार समाज के तरफ से (ssc और HSC ) में उतीर्ण होने के लिए सभी विद्यार्थियों का हार्दिक अभिन

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Posted on 2017-06-13



Heartily congratulations of every talented Students of society from the Kirat Kirat Kirar Samaj. All the students who have passed good number in SSC and HSC. Tributes and hard work of such talented students of society. You have linked all of the society that you will illuminate the name of society by your hard work.

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किराड़ किरात किरार समाज के तरफ से समाज के हर एक प्रतिभावान विध्यार्तीयों का मनपूर्वक हार्दिक अभिनंदन | आप सभी विद्यार्थियों जो SSC तथा HSC में अच्छे नंबर से उत्तीर्ण हुए | समाज के ऐसे प्रतिभाशाली विद्यार्थियों की मेहनत और लगन हो नमन करता है | समाज की आप सभी को दुवाए है के आप ऐसे ही अपने मेहनत से समाज का नाम रोशन करेंगे |

किराड़ किरात किरार समाज उन विद्यार्थियों का भी अभिनन्दन करता है जिन्होंने खेल - कूद या किसी अन्य क्षेत्र में जैसे (UCMASS , Painting , competitive exam ) में समाज का नाम रोशन किया है !

समाज के भाई - बंधुओं से गुजारिश है के वह ऐसे किसी भी विद्यार्थी की मार्कशीट निचे दिए गए नंबर पर whatsapp करे | आने वाले दिनों में हम सभी विद्यार्थियों का सम्मान कार्यक्रम में सम्मानित करेंगे |

whatsapp निचे दिए गए नंबर पर करे

लष्मीकांतजी दादूरिया (सदर , नागपुर ) :- 9970547806
सतीशजी बरबटे (धरमपेठ , नागपुर ) :- 9850247071
अरुणजी हारोडे (नेताजी नगर , नागपुर ) :- 9765545557
राजेशजी झाड़े (छापरु नगर , नागपुर ) :- 9371937937
www.kirad.in


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किराड़ किरात समाज का भुजलिया महोस्तव निमंत्रण

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Posted on 2017-07-30



किराड़ किरात समाज के सभी भाई बंधुओं को सूचित किया जाता है की हर वर्ष की तरह नागपुर शहर में ८-८-२०१७ को भुजरिया पर्व परंपरागत रूप से मनाया जाएगा।| 

इस वर्ष भी किराड़ किरात समाज के तरफ से भुजलियों के महोस्तव का आयोजन ८-८-२०१७ को कटारियां मंगल कार्यालय , पारडी नाका , नागपुर में रखा हुआ है | आप सभी को महोस्तव में सहर्ष आमंत्रित किया जाता है | सभी भाई - बन्धुओं से निवेदन है के वह श्याम ५.०० बजे भुजलियाँ लेकर कटारिया मंगल कार्यालय में पहुंचे | कार्यक्रम की रूप - रेखा नीची दीये बैनर में दखे !

किराड़ किरात बन्धुओ से निवेदन है के वह कार्यक्रम में जरूर शामिल हो !

समाज सेवी
किराड़ किरात समाज

महोत्सव के नाम: भोजली महोत्सव

 
उत्सव मनाने का समय (माह) : भोजली महोत्सव भाद्रपद हिन्दू महीने (अगस्त - सितंबर) में  मनाया जाता है 
 
 
Bhujaliya


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किराड़ किरात समाज का भुजलियों का कार्यक्रम मनाया गया

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Posted on 2017-08-12



किराड़ किरात समाज का भुजलियों का कार्यक्रम ८-८-२०१६ को कटारिया मंगल कार्यालय, पारडी नाका में
मनाया गया , कार्यक्रम में बच्चो के लिए मनोरंजन के लिए डांस , विशेष रूप से योग डांस का कार्यक्रम रखा गया | सभी दर्शक ने इस कार्यक्रम को सहारा |
भुजलियों के कार्यक्रम की रुपरेखा दिलीप सूर्यवंशी और उनके मित्रगण मंडल ने तैयार की|
कार्यक्रम में प्रमुख अतिथियों को भी भी बुलाया गया और उनका सम्मान किया गया |
कार्यक्रम में उत्तीर्ण हुए १०वी , १२वी के विद्यार्थियों का सम्मान किया गया |
कार्यक्रम के अंत में भोजन की व्यवस्था की गयी थी ! सभी समाज के भाई - बंधुओं ने इस कार्यक्रम का आनद लिया |

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भुजलियों का कार्यक्रम और भी नागपुर क्षेत्रों में किराड़ किरात भाइयों के तरफ से मनाया गया , कन्हान, गोंदिया , रामटेक ऐसे बहोत स्थान में हमारे भाइयों ने इस कार्यक्रम को मनाया |

Bhujliya

 

bhujliya


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सौरभ नानुरे इनका आमगाव यहाँ पर हुए क्रीडा सम्मान में सम्मानित किया गया !

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Posted on 2017-09-03



२९/०८/२०१७ को हमारे समाज के प्रतिभावान सौरभ नानुरे इनका आमगाव यहाँ पर हुए क्रीडा सम्मान में सम्मानित किया गया !
 
हमें गर्व है के हमारे समाज के इस छात्र ने क्रीडा roll-ball skating में नेशनल लेवल में अपना नाम दर्ज कराया और अब सौरभ नानुरे नेशनल प्लेयर बन चूका है! ३ माह पूर्व पुणे में हुए मैच में इनके टीम ने पहला स्थान प्राप्त किया था!
सम्मान में इनने कुछ राशी और gold-medal दिया गया!
 
हम आशा करते है के ऐसे ही समाज के सभी बच्चे क्रीडा जगत में भी समाज का नाम रोशन करे!
 
किराड किरात समाज के तरफ से हार्दिक बधाईया !!!!


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