जीवन गौरव पुरस्कार | समाजविभूति कुन्जिलालजी धाकड़

(कभी न रूकनेवाला एक कदम ….)

समाजकार्य ही जिसकी पूजा और प्रगती ही उनका लक्ष्य….

व्यक्ति यदी मन में ठान ले तो असंभव को भी संभव बना देता है । इसीलिए कहा जाता है कि
नेपोलियन की डायरी से “असंभव” शब्द को जगह नही था ना ही कभी नेपोलियन को अपने नाटे कद से कोई शिकायत थी । किराड़ (किरात) समाजामेँ ऐसे बहुत कम ही होंगे जिन्होंने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर समाज को एक नई दिशा एक नई पहचान देकर नई पिढी के सन्मुख समाजका महत्व प्रतिपादित किया है । श्री. कुंजीलालजी धाकड़ , समाजमे किसी परिचय के मोहताज नहीं है । एक लम्बी संघर्षशील जीवन यात्रा तय करनेवाले श्री धकड़जी का किराड (किरात) समाजसदैव ऋणी रहेगा, जिन्होंने अभावों में कार्य करते हुए समाज को एक मंच – एक संगठन, एक विशाल भवन को साकार स्वरूप देकर मिलन का केंद्र बिंदु बनाया । आज कई समाज ऐसे भी जिन्हे भवन के लिए जमीन प्राप्ति के लिए संघर्ष करना पड रहा है । कहते है कि कर्मठ व्यक्ति हर मुसीबतों को भी आसान बना लेता है । ऐसा ही कुछ श्री. धाकडजी ने “आगे बढो, रुको मत” के सिद्धांत पर वह कर दिखाया जो उन्होंने मन ने दॄढ निचय कर रखा था । आज एक दर्पण की तरह सब कुछ हमारे सामने है । सेवा को प्रमाण की आवश्यकता नही होती और नही सेवा की तुलना की जा सकती है । सच्चे, कर्तव्यनिष्ठ कार्यकर्ता का “आभूषण” और “पहचान” उनकी सेवा ही सच्चा सम्मान है जो नई पिढी में एक नया जोश, एक नई चेतना, एक नया जज्बा पैदा कर देता है । उनकी उपस्थिती से हर “कार्य में नई पिढी को प्रेरणा, मार्गदर्शन तो मिलता ही है साथ ही, कार्य करने का कुशल नेतृत्व क्षमता का भाव भी उनमे कूटकूट कर भरा पडा है ।

उनके संघर्ष को शब्द सीमा में व्यक्त करना कठिन है । उनकी सघर्ष यात्रा का पहला कदम आखिर किस रूप ने शुरू हुआ इसे जानने के लिए उनके आरम्भिक संघर्ष दौर को समझना अत्यंत आवश्यक है ।

श्री पतिरामजी धाकड के यहाँ २६ जुलाई, १९३६ , को ग्राम धरनी पोस्ट सिमझिरा , तहसील मुलताई, जिला बैतूल. में जन्मे श्री कुन्जिलालजी धाकड़ के दो भाई व दो बहाने है । मालगुजारी का पैतृक व्यवसाय करने वाले श्री. पतिरामजी ४०० एकड़ के मालिक थे । परिवार की जिम्मेदारी और समाज के प्रती रूझान से कुंजीलालजी को समाजसेवा का खुला आसमान नजर जाने लगा । बी. ए. तक अध्ययनरत श्री धाकड़ जी ने हिस्लॉप व सिरी कॉंलेज से शिक्षा पूर्ण की ।

समय ने करवट ली । धारणी छोड धाकड परिवार नागपुर आकर दाजीबा नैनोरे के घर से किराये से रहने लगा | सघर्ष का दौर नागपुर से शुरू कर नई परिभाषा लिखने वाले श्री कुन्जिलालजी ने फिर पीछे मूड कर नहीं देखा| १९५२ से १९७४ तक दूध का व्यवसाय कर आम जनता में पैठ बनाने में जुठ गए | समय ने साथ दिया , संघर्ष जारी रहा |

आरंभ में दुर्गा टिम्बर में ६ माह कार्य किया । अनुभव बढ़ने लगा नागपुर की पहचान टिम्बर मार्किट के रूप में एशिया में नम्बर वन थी । १९६१ में भवानी टिम्बर मार्ट में १ वर्ष कार्य कर हौसलों में सुदृढ़ आफजाई की । १९६२ मे गणेश टिम्बर मार्ट को साझेदारी के रूप मे चलाया । पश्चात स्वयं ने ‘टिम्बर’ के मेदान ने एक पृथक पहचान बनाने के लिए पहला ‘आत्म सम्मान’ का कदम रखा । वर्ष १९६४ में ‘महेश टिम्बर मार्ट’ के रूप ने कदम-दर-कदम सफ़लता मिलती गयी । पहचान बढी । शोहरत मिली । वर्ष १९६७ ने किराये से आरा मशीन ली । ४ वर्षो पश्चात दूसरी मशीन १९७६ तक चलायी । मन मे समाज सेवा का जज्बा जिन्दा था। कभी न डिगमगाने वाले कदमो का रूख समाजसेवा में भी बढता चला गया । परिवार का हर काम पर सहारा मिला । मार्गदर्शन मिला । वर्ष १९७६ से स्वयं की आरा मशीन ने व्यापार को नई पहचान दी । राजनीति की परिभाषा से परिचित श्री कुंजीलालजी ने सर्वप्रथम वर्ष १९८० से १९८४ तक नागपुर टिम्बर मार्ट संध के सचिव के रूप में पहचान को नया रूप दिया । जिम्मेदारी बढाई जनता ने विश्वास दिया । पश्चात् वर्ष मे वाइस प्रेसीडेन्ट बने, नेतृत्व बढा तो वर्ष १९८७ से १९८९ तक अध्यक्ष पद को भी सुशोभित किया । वर्ष १९९२ से १९९५ तक नगरसेवक (पार्षद) बने | समाजसेत्र में भी कई जिम्मेदारियों का निर्वाह कर एक मिसाल पेश की | वे नवयुवक किराड (किरात ) समाज, नागपुर के अध्यक्ष भी रहे | अ.भा. किराड क्षत्रिय महासभा, ग्वालियर के नागपुर जोन से संयुक्त मंत्री बनाए गए । महाराष्ट्र टिम्बर लधु उद्योग महासंघ, पुणे के सचिव भी रहे । वे नागपुर कांग्रेस में महासचिव, किराड धर्मशाला रामटेक के सचिव भी रह के है । यहां तक कि वे डां. दडवी मेमोरियल हास्पिटल नागपुर के उपाध्यक्ष भी रहे चुके है ।

लकड़ा उद्योजक किरायेदार व्यवसाय संध नागपुर के सचिव पद का भी निर्वाह किया । कभी स्वप्नमें विश्वास न करनेवाले श्री. कुजीलालजी धाकड ने ‘संघर्ष’ को दोस्त बनाकर हर मुश्किलों को आसान बनाते हुए हर क्षेत्र में शिक्षा, स्वभाव व व्यवहार से सेवा को गौरवान्वित किया । संपुर्ण महाराष्ट्र के किराड़ (किरात) ही नही अ. भा. स्तर पर भी समाज श्री. कुन्जिलालजी धाकड के त्याग, सेवा, स्वभाव व कर्मण्यता का लोहा मानता है । नि:संदेह श्री धाकड समाज संगठन संस्थापना के आधार स्तम्भ पुरुष है, जिनसे युवा पिढी सदैव मार्गदर्शन व प्रेरणा लेकर समाज को रचनात्मक व संगठित करने से धन्यता महसूस करेगी।

आपके इन आदर्शी से प्रभावित होकर महाराष्ट्र किराड (किरात) समाज आपको “जिवन गौरव पुरस्कार” प्रदान करता है ।

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Author: Kirad