संतुलित आत्मानुशासन ही, समाज की प्रगति सुनिश्चित करता

समाज की प्रगति में संतुलित आत्मानुशासन का होना सबसे महत्वपूर्ण है! जो समाज को पूर्णता की और ले जाने का मार्ग तय करता है! आक्रोशित या उग्रता गर्त में धकेलने का रास्ता दिखाती है, उत्तेजित संवाद से समाज में सार्थक परिणाम की अपेक्षा नही रखी जा सकती है, अन्य के दृष्टिकोण में आपके प्रति सकारात्मक भाव तब ही जन्म लेंगे की आप धैर्यवान हैं ,सहिष्णु हैं! क्यों कि धैर्य व संयम अन्य के लिए प्रेरक होता है! हम जिसे स्वयं के लिए सर्वोत्तम मानते है, वह दूसरों के लिए प्रशंसनीय बन कर प्रेरणा बन जाती है! ऐसी विस्तारित सोच के साथ समाज आगे बढ़े, जिसका सम्मान अन्य समाज में भावनात्मक हो कर हमें श्रद्धा व आदर की दृष्टि से देखें!


वैसे देखा जाए तो विषमताओं के बीच ही सही अर्थों में पुरूषार्थ व सामर्थ्य जीवन बनते हैं ! मन को खुश रखने के लिए, अन्य को भी खुश देखने के भाव जागृत करना होते हैं! परिस्थिति जन्य समझौते जीवन को आगे बढ़ने व प्रसन्नचित रहने के लिए कारगर होते हैं ! सफलता को हासिल करने के लिए, संघर्ष जीवन के आने वाले समय – क्रम का सुख है, जिसे स्थायित्व देना आपका शहनशील कर्म तय करता है!


वैसे तो निश्छल सुख जितनी आसानी से प्रकृति से मिलता है, वह शायद किसी और से नहीं ?

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Author: बालमुकुंद नागर (धाकड़ )