समाज सेवा एक पुनीत कार्य

प्रत्येक मुनष्य को अपने समाज की सेवा का कार्य करना आवश्यक एवं पुनीत कार्य हैं ।

किसी विद्वान ने भी ठीक कहा है कि “जो व्यक्ति अपने समाज को सेवा नहीं कर सकता, उससे देशहित को अपेक्षा करना व्यर्थ है ।

अब हमारे मस्तिष्क में प्रश्न उठता है कि हम समाज सेवा किस प्रकार करे तो मेरा मत यहाँ इस प्रकार है वैसे  समाज सेवा के प्रकार अनेक है परन्तु मेरे मतानुसार हम इस प्रकार भी समाज सेवा कर सकतेहैं ।

( १ ) सर्वप्रथम हम अपने बच्चों को अनिवार्य रूप से शिक्षित करे  उन्हें अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलवाये विशेष तौर से बालिकाओं पर भी हम विशेष ध्यान दे क्योंकि शिक्षित नारी को शोभा होती है।

आज शिक्षा का महत्व अधिक बढ गया हैं । आने वाला समय शिक्षित लोगों का ही होगा । हम देख रहें हैं कि आजकल राजनीति में भी शिक्षा का स्तर देखा जाने लगा है, जैसे ग्राम न्यायालय एवं ग्राम कोषाध्यक्ष के पद पर नियुक्ति में शिक्षित होना देखा जा रहा है । एक पढ़ा लिखा व्यक्ति अनपढ की तुलना मे कृषि कार्य अच्छे ढंग से कर सकता हैं । क्योंकि रासायनिक खाद अच्छे बीजों का चयन, पानी की मात्रा, उर्वरा शक्ति आदि में पढ़ा  लिखा होना आवश्यक हो गया हैं । इसलिए हम अपने-अपने बच्चों को गांव के समाज के क्षेत्र के बच्चों को पढाये व पढ़ने हेतु प्रेरित करे । क्योंकि अशिक्षा ही सब बुराइयों की जड होती हैं।

( २ ) बाल विवाह पर रोक : – हम अपने समाजमें होने वाले बाल विवाहों पर रोक लगावे ।  बालक को उम्र २१ वर्ष तथा बालिका की  उम्र  १८ वर्ष  पश्चात ही विवाह करें । यदि इसके विपरीत कोई करता है तो उन्हें उसके होने वाले दुष्परिणामों के विषय में बतायें । २१ एवं १८ वर्ष में शादी होने के पश्चात उत्पन्न संतान पूर्ण स्वस्त होंगी, तथा बालिका का भी शारीरिक रूप से पूर्ण विकास होगा ।

कम उम्र में शादी होने से उत्पन्न संतान कमजोर होंगी जो समाज एबं देश हित में हानिकारक होगा तथा निर्धारित उम्र में शादी करने से समाज का स्तर भी सामाजिक रूप से बढेगा । हम पिछड़े समाज  में नहीं गिने जायेगे । इस प्रकार भी हम समाज सेवा का एक पुनीत कार्य कर सकते है ।

( ३ ) दहेज प्रथा :- आज हमारे समाजमे भी धीरे धीरे दहेज़ प्रथा का प्रचलन बढता जा रहा है जो ठीक नहीं हैं, इस कारण अनेक गरीब समाज के व्यक्ति अपनी बालिकाओं को शादी चाहते हुए भी अच्छे और उचित वर के साथ पैसों के अभाव में नहीं कर पा रहे हैं । दहेज़ प्रथा एक कलंक है जिसे हमे मिटाना होगा इसके कारण हमारे समाज के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं । इसके निवारण के लिए हम आदर्श सामूहिक विवाह अपनाये गुना,  शिवपुरी क्षेत्र मे, एवं राजस्थान में इस प्रथा का प्रचलन प्रारम्भ हो चुका हैं, किन्तु इसके अपनाने में एक बात की विशेष ध्यान देने की  जरुरत है,  वह हैं बाल विवाह न होनें दें! आदर्श विवाह की ओट में कहीं-कहीं बाल विवाह हो जाते हैं यह भी एक गम्भीर समस्या है ।

अत: न तो हम स्वयं दहेज लें, न दहेज़ देवें ऐसी मनोदशा सोच हमारी स्वयं बनाये तभी हम इस बुराई से बच सकेगें ।

( ४ ) मृत्यु भोज :- हमारे समाज में प्रचलित मृत्यु भोजों को हम बंद करें । जिससे फिजूल में होने वाले अपव्यय को रोके । मृत्यु भोज के स्थान पर मृतक के नाम से धर्मशाला, छात्रावास स्मारक आदि के नाम पर धन का व्यय करे । तथा ऐसा भी सम्पन्न व्यक्ति ही करे । गरीब व्यक्ति अपने सामर्थ अनुसार कार्य करे । जिससे समाज के धन पर रोक लग सकती है । बचत के धन का उपयोग परिवार व समाज के विकास पर खर्च करे  ।

– गिरिराज सिह किरार, कार्यकारिणी सदस्य, अ. भा. कि. क्ष. महासभा

विकास नगर, ए.बी. रोड गुना (म.प्र.)

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Author: Kirad