धैर्य व संयम से ही, समाज का एकीकरण संभव ?

समाज सेवा में सफल होने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ होना बेहद जरूरी है! सामाजिक चुनौतियां और मुश्किलें रास्ते में बाधक बनती है,लेकिन इनको हल करने के लिए, इन्हीं को प्रेरणा बना ले तो सफलता मिल ही जाती है! सही लक्ष्य का निर्धारण,अथक मेहनत और ईमानदारी से ही अपने किए हुए कार्य से अंजाम तक पहुंचा जा सकता है! यह तो तय है कि समाज को दिशा व निर्देश देने के लिए ‘महासभा, की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है कि वह समाज में गुणवत्ता लिए हुए, संस्कारों का निर्माण कैसे करें? समाज की संस्कृति को झटपट तो गढ़ा नही जा सकता, इसमें तो वर्षों लग जाते हैं और इन्हीं संस्कृति की कोंपलों से फुटकर परंपराएं जन्म लेती हैं और समाज अपने अथक परिश्रम से ये परंपराएं जिन्दा रखता है!


यदि ‘महासभा, नेतृत्व अपने विलक्षण दायित्व से सकारात्मक सोच से समाज पोषित विचारों का ध्यान रखकर आगे बढ़ते हैं तो, समाज की दिशा व दशा को बदलने में वक्त नहीं लगेगा ? लेकिन नेतृत्व का नजरिया सिर्फ, जब जितना समय-अवसर मिले जरूरत मंद की और सहायता का हाथ जरूर बढ़ाएं !असहाय लोगों की मदद के लिए तत्पर रहें, तभी समाज की दुआएं आपके साथ रहेगी, जो आपको अपनी की गई जनसेवा से जीवन भर ऊर्जा मिलती रहेगी! ऐसे आत्मीयता वाले निश्चल भाव ही समाज की निगाह में ‘महासभा, नेतृत्व के प्रति आस्थावान दृष्टिकोण तैयार करेगी !

हर सकारात्मक परिवर्तन ‘महासभा, के लिए आकर्षण होगा, जो बेहतर आने वाले कल की बुनियाद होगी, जिस पर हमें गर्व की अनुभूति हो सके!

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Author: बालमुकुंद नागर (धाकड़ )